बच्चों की मुस्कान हमारी पहचान
मैं आपकी दोस्त दिशा दर्शन शाह पटवा हूँ। आपने मेरी कई कहानियाँ और लेख पढ़े हैं, जिनके माध्यम से मैंने कभी आपका मनोरंजन करने की कोशिश की, तो कभी समाज के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया।
लेकिन आज मैं किसी कहानी के बारे में नहीं, बल्कि एक ऐसे विषय पर बात करना चाहती हूँ जिसके बारे में हर कोई सोचता है, दुखी भी होता है, लेकिन खुलकर बात करने से अक्सर बचता है। वह विषय है—लड़कियों और बच्चियों की सुरक्षा।
सबसे पहले मैं यह कहना चाहूँगी कि सरकार ने महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण कानून बनाए हैं और समय-समय पर नए कदम भी उठाए हैं। लेकिन एक सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है—क्या सिर्फ कानून बना देने से हमारी बेटियाँ पूरी तरह सुरक्षित हो गई हैं?
आज का माहौल देखकर दिल डर जाता है। पहले भी अपराध होते थे, लेकिन आज जब भी सोशल मीडिया या न्यूज़ खोलती हूँ, लगभग हर दिन किसी न किसी बेटी के साथ हुई हैवानियत की खबर सामने आ जाती है।
कहीं स्कूल जाने वाली बच्ची के साथ दुष्कर्म, कहीं छह साल की मासूम के साथ अमानवीय अपराध, तो कहीं तेरह साल की बच्ची के साथ ऐसी क्रूरता कि पढ़कर ही रूह काँप जाए।
यह खबरें सिर्फ न्यूज़ नहीं होतीं… ये किसी माँ की दुनिया उजड़ने की कहानी होती हैं। किसी पिता के टूटे हुए सपनों की आवाज़ होती हैं। किसी मासूम बचपन की चीख होती हैं, जिसे शायद वह जिंदगी भर भूल नहीं पाएगी।
हम अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए बहुत कुछ करते हैं। उन्हें अच्छे संस्कार देते हैं, सावधान रहना सिखाते हैं, स्कूल छोड़ने जाते हैं, समय-समय पर फोन करते हैं और हर पल उनकी चिंता करते हैं। लेकिन फिर भी अगर समाज में ऐसी घटनाएँ लगातार होती रहें, तो सवाल सिर्फ परिवार पर नहीं, बल्कि पूरे समाज पर उठता है।
हमें यह समझना होगा कि सिर्फ बेटियों को सावधान रहने की सीख देना काफी नहीं है। बेटों को महिलाओं का सम्मान करना भी सिखाना होगा।
बदलाव की शुरुआत घर से होती है। जब एक लड़का बचपन से यह सीखेगा कि हर लड़की सम्मान की हकदार है, तभी समाज सच में बदलेगा।
अगर कहीं किसी लड़की या बच्चे के साथ गलत होता दिखे, तो चुप मत रहिए। आपकी एक आवाज़, एक कदम और एक शिकायत किसी की ज़िंदगी बचा सकती है। अपराधियों का सबसे बड़ा हथियार लोगों की चुप्पी होती है।
आज ज़रूरत सिर्फ कानून की नहीं, बल्कि जागरूकता, संवेदनशीलता और इंसानियत की भी है। हमें ऐसा समाज बनाना होगा जहाँ कोई भी लड़की शाम को घर लौटते समय डर महसूस न करे, जहाँ कोई माँ अपनी बेटी के बाहर जाने पर हर पल चिंता में न रहे, और जहाँ हर बच्चा सुरक्षित बचपन जी सके।
आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा केवल सरकार या पुलिस की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सभी की जिम्मेदारी है।
क्योंकि जिस समाज में बेटियाँ सुरक्षित नहीं होतीं, वह समाज कभी भी वास्तव में विकसित नहीं कहलाता।
आइए, आवाज़ उठाइए… क्योंकि चुप्पी कभी किसी मासूम की रक्षा नहीं कर सकती। हमें अब बच्चों की रक्षा स्वयं करनी होगी। मैं एक मां हुं इसलिए ये लेख लिखकर बस आप सब को जागरूक करना चाहती हुं।

लेखक परिचय — दिशा दर्शन शाह पटवा
दिशा दर्शन शाह पटवा एक कुशल और संवेदनशील लेखिका हैं, जिन्हें कहानी कहने का गहरा जुनून और भावनात्मक विवरणों को पकड़ने की अद्भुत दृष्टि प्राप्त है। उनकी लेखन यात्रा में प्रेम, रिश्तों, और जीवन के विविध पहलुओं पर आधारित कहानियां, कविताएं और कल्पनात्मक रचनाएं विशेष स्थान रखती हैं।
अपने लेखन सफर में दिशा के सबसे मजबूत स्तंभ उनके माता‑पिता (विशेषकर उनके पिता अर्जेश पटवा), उनके ससुरालवाले, और उनके पति दर्शन शाह रहे हैं — जिनके सहयोग और प्रेरणा से उन्होंने अपनी रचनात्मक पहचान को और भी सशक्त बनाया है।
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