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प्रीति और प्रतीक की कहानी

यह कहानी गुजरात के अहमदाबाद शहर की सामली स्कूल की छात्रा प्रीति की है। प्रीति जितनी सुंदर थी, उतनी ही पढ़ाई में होनहार भी। उसके सपने बहुत बड़े थे—वह अपना नाम प्रसिद्ध करना चाहती थी।

एक दिन प्रिंसिपल कक्षा में एक नए छात्र को लेकर आए। उसका नाम था प्रतीक। वह आकर्षक और मनमोहक था, और स्कूल के ट्रस्टी का पोता भी। लड़कियाँ उसकी ओर खिंचती चली गईं, और प्रीति भी उसे देखे बिना नहीं रह सकी। उस उम्र में भावनाओं पर काबू पाना आसान नहीं होता।

प्रतीक पढ़ाई में रुचि नहीं रखता था, लेकिन जीवन का आनंद लेना जानता था। संयोग से प्रदूषण रोकने पर आधारित एक बड़े प्रोजेक्ट में प्रीति और प्रतीक को जोड़ीदार बनाया गया। शुरुआत में प्रतीक ने उसे नज़रअंदाज़ किया, पर धीरे-धीरे दोनों के बीच दोस्ती गहरी होती गई।

प्रीति ने इस दोस्ती को प्यार समझ लिया और मन ही मन प्रतीक को अपना मानने लगी। लेकिन प्रतीक ने साफ कहा कि वह रिश्तों पर विश्वास नहीं करता—उसके माता-पिता के झगड़ों ने उसे रिश्तों से दूर कर दिया था। फिर भी उसने प्रीति को अपनी सबसे अच्छी दोस्त माना।

समय बीतता गया। तीन महीने बाद कॉलेज की क्रिसमस पार्टी में जब प्रीति किसी और लड़के के साथ नाच रही थी, तो प्रतीक को अचानक गुस्सा और जलन महसूस हुई। उसी क्षण उसे एहसास हुआ कि वह प्रीति से प्यार करने लगा है। अगले दिन उसने प्रीति को प्रपोज़ कर दिया।

प्रीति हैरान रह गई, लेकिन खुशी से उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। प्रतीक ने कहा, “मैं रिश्तों से डरता था, पर तुमने मुझे भरोसा करना सिखाया है। तुम्हारे साथ सब अच्छा लगता है।”

उस पल से उनकी दोस्ती ने प्यार का रूप ले लिया। और जैसा कहते हैं—जब प्यार सच्चा होता है, तो वह मंज़िल तक ज़रूर पहुँचता है।

लेखिका परिचय

दिशा दर्शन् शाह पटवा एक प्रतिभाशाली लेखिका हैं, जिन्हें कहानी‑कहने की कला और बारीकियों को समझने का गहरा जुनून है। उन्हें फ़िक्शन, कविता, रिश्तों और प्रेम पर आधारित कहानियाँ लिखना बेहद पसंद है। लेखन की इस यात्रा में उनके सबसे बड़े सहारे उनके माता‑पिता (विशेषतः उनके पिता अर्जेश पटवा), उनके ससुरालजन और उनके पति दर्शन् शाह रहे हैं।

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