डरावनी रात!
जब भी मैं उस रात के बारे में सोचती हूँ, मुझे नींद ही नहीं आती। अगर आप मेरी यह कहानी पढ़ेंगे तो आपके भी रोंगटे खड़े हो जाएंगे और आप भी डर के मारे काँप उठेंगे। इस कहानी को पढ़ने के बाद आप भी भूत‑प्रेत पर विश्वास करने लगेंगे और रात को अकेले निकलने से पहले हज़ार बार सोचेंगे।
तो चलिए, मैं आपको यह कहानी बताना शुरू करती हूँ।
यह घटना मेरे कॉलेज के दिनों की है। उन दिनों हम हमेशा कुछ न कुछ नया और अतरंगी एडवेंचर करने के लिए तैयार रहते थे। और इसी एडवेंचर के चक्कर में हम एक बड़ी और भयानक मुसीबत में पड़ते‑पड़ते बचे थे। मेरा नाम दिशा है। फिलहाल मैं मुंबई में रहती हूँ और मैंने अपनी पढ़ाई M.K. Gandhi College से पूरी की है। मुझे आज भी याद है कि कॉलेज के आखिरी साल में कुछ ऐसा हुआ था जिसने मेरी पूरी ज़िंदगी बदल दी।
कॉलेज का आखिरी साल था, तो मैंने और मेरे दोस्तों ने सोचा कि फ़ाइनल परीक्षा से पहले एक नाइट‑आउट किया जाए। रात को मेरे दोस्त मेरे घर आने वाले थे क्योंकि मेरे घर पर कोई नहीं था। मेरे घर वाले रिश्तेदार के यहाँ एक फ़ंक्शन में गए थे। मैं नहीं गई क्योंकि मेरा पहले से दोस्तों के साथ प्लान बना हुआ था। मेरे छह‑सात दोस्त आने वाले थे। मैंने खाने‑पीने की सारी तैयारी कर ली थी। लोग टाइम पर आ गए। पहले तो बहुत मस्ती‑मज़ाक हुआ और डांस भी किया। बाद में सबने थोड़ा‑बहुत ड्रिंक किया और गेम खेलने लगे।
बातों‑बातों में सब लोग भूत‑प्रेत की बातें करने लगे। हमारे इलाके में एक सड़क ऐसी थी जिसे लोग शापित सड़क कहते थे, क्योंकि वहाँ बहुत सारे एक्सिडेंट हुए थे। कहते थे कि वहाँ आत्माएँ घूमती हैं।
मेरे एक दोस्त ने कहा, “चलो उस सड़क पर चलते हैं। मैंने उस रास्ते के बारे में बहुत कुछ सुना है। आज देखते हैं कि भूत या आत्माएँ सच में होती हैं या नहीं।”
मैंने तुरंत मना किया क्योंकि रात के 3 बजे थे, गहरा अंधेरा था और मुझे बहुत डर लग रहा था। लेकिन मेरे दोस्तों ने मेरी एक भी बात नहीं सुनी और वे मुझे भी खींचकर ले गए। मैं कुछ नहीं कर पाई।
आधे घंटे में हम सब वहाँ पहुँच गए। सब लोग गाड़ी से बाहर निकलकर इधर‑उधर घूमने लगे। रात के 3:30 बजे थे, इसलिए वहाँ काफ़ी सन्नाटा था। बाजू में कब्रिस्तान भी था, इसलिए मेरी हिम्मत ही नहीं हुई बाहर निकलने की।
सब लोग मस्ती कर रहे थे कि अचानक एक लड़की की आवाज़ आई। सबको लगा कि यह भ्रम है, पर फिर वही आवाज़ दोबारा आई— “मेरी मदद करो… मुझे इस कैद से आज़ाद कराओ…” और वह रोने लगी।
मेरे दोस्तों ने इधर‑उधर देखा, पर वहाँ कोई नहीं था। सब डर के मारे गाड़ी में बैठ गए। मेरे एक दोस्त ने गाड़ी स्टार्ट करने की कोशिश की, पर गाड़ी स्टार्ट ही नहीं हो रही थी। पेट्रोल फुल था, सर्विसिंग भी करवाई थी, फिर भी गाड़ी चालू नहीं हो रही थी।
अचानक किसी ने गाड़ी के पास आकर काँच पर ज़ोर‑ज़ोर से मारना शुरू किया। पर कौन मार रहा था—वह दिख नहीं रहा था। हम सब बुरी तरह डर गए।
तभी मैंने ज़ोर‑ज़ोर से हनुमान चालीसा पढ़ना शुरू किया और उसी पल गाड़ी स्टार्ट हो गई। हम वहाँ से तेज़ी से भागे। वहाँ पहुँचने में हमें आधा घंटा लगा था, लेकिन वापस आने में सिर्फ़ 15 मिनट लगे।
घर पहुँचकर सब बहुत डर गए थे। मैंने उन्हें कहा कि आत्माएँ होती हैं, पर दिखाई नहीं देतीं। कभी भी आत्माओं को परेशान नहीं करना चाहिए, क्योंकि अगर हम उन्हें परेशान करेंगे तो वे हमारी ज़िंदगी बर्बाद कर सकती हैं। सबने मेरी बात से सहमति जताई।
जब मैं उस रात के भयंकर नज़ारे के बारे में सोचती हूँ, मेरी रूह काँप जाती है।
वैसे मैं इस घटना से भूत‑प्रेत को बढ़ावा नहीं दे रही हूँ, पर हाँ—मैं यह ज़रूर कहना चाहती हूँ कि कुछ supernatural powers होती हैं जिन्हें हमें कभी चुनौती नहीं देनी चाहिए। कुछ शक्तियाँ हमें दिखाई नहीं देतीं, पर रियल लाइफ़ में होती हैं। अतृप्त आत्माएँ अपनी इच्छाएँ पूरी करने के लिए शरीर ढूँढती हैं। उनकी शक्तियाँ रात 12 बजे से जागृत होकर 3 बजे तक चरम पर होती हैं। इसलिए हमें रात को ऐसी जगहों पर नहीं जाना चाहिए।
बहुत कम लोगों को पता है कि काली शक्तियों का भी एक समय होता है और वे उसी इंसान पर हमला करती हैं जिसका मन कमजोर होता है—और उस समय हमारा मन चाहें या न चाहें, कमजोर हो ही जाता है। इसलिए हमें इन सब बातों का ध्यान रखना चाहिए।

लेखिका परिचय
दिशा दर्शन् शाह पटवा एक प्रतिभाशाली लेखिका हैं, जिन्हें कहानी‑कहने की कला और बारीकियों को समझने का गहरा जुनून है। उन्हें फ़िक्शन, कविता, रिश्तों और प्रेम पर आधारित कहानियाँ लिखना बेहद पसंद है। लेखन की इस यात्रा में उनके सबसे बड़े सहारे उनके माता‑पिता (विशेषतः उनके पिता अर्जेश पटवा), उनके ससुरालजन और उनके पति दर्शन् शाह रहे हैं।

